बापू कल्याण दास जी महाराज
सत्य के एक गहन साधक जिन्होंने वैराग्य अपनाया, बापू ज्वाला सिंह जी से नाम दीक्षा प्राप्त की और गदरपुर में एक शाश्वत आध्यात्मिक विरासत छोड़ी।
संक्षिप्त जीवनी तथ्य
दिव्य जीवन यात्रा
संत श्री पं. कल्याण दास जी महाराज का जन्म कस्बा पायल (रियासत पटियाला) में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका जन्म नाम पं. कपूर चन्द जी था और उनके पिता का नाम पंडित श्री चिरंजी लाल जी था। उन्होंने उर्दू, फारसी और संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की तथा संगीत की भी विधिवत शिक्षा ली। बचपन से ही उनका स्वभाव वैराग्यपूर्ण था।
कम आयु में उनका विवाह श्री प्रेम देवी जी से हुआ, लेकिन उनका मन गृहस्थ जीवन में नहीं लगा और उन्होंने घर-बार त्याग दिया। सतगुरु की तलाश में काशी, हरिद्वार आदि की यात्रा करते हुए वे तलवंडी (मुल्तान) पहुँचे और अपनी योग्यता से उदासीन गद्दी के महन्त बने। आध्यात्मिक मार्ग पर उनकी भेंट बापू ज्वाला सिंह जी से हुई, जिनकी कृपा से उन्हें "नाम" की दीक्षा मिली और "कल्याण दास" नाम प्रदान किया गया।
जीवन के अंतिम दिनों में वे पलवल (हरियाणा) चले गए और कुछ बीमारी के पश्चात संवत् 1993 विक्रमी की माघ प्रविष्टि 25 को ज्योति-जोत समा गए। उनकी पावन स्मृति में जिला नैनीताल के गदरपुर में "कल्याण नगर" बसाया गया और भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया, जहाँ हर वर्ष चैत्र मास में वार्षिक स्मृति यज्ञ आयोजित किया जाता है।
गुरु की स्मृति केवल इतिहास का हिस्सा नहीं होती, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश का मार्ग बनती है। बापू ज्वाला जी सिंह जी एवं संत परंपरा से जुड़ी यह पावन धारा आज भी संगत को श्रद्धा, सेवा, सिमरन और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
आध्यात्मिक वंशावली
दर्शन और प्रवचन