बापू हरनाम जी महाराज
उन्होंने सांसारिक पद और धन का त्याग किया, अपना जीवन भक्ति, कठोर तपस्या और मानवता की निस्वार्थ सेवा को समर्पित किया।
संक्षिप्त जीवनी तथ्य
दिव्य जीवन यात्रा
बापू हरनाम जी महाराज का जन्म 2 मघर (17 नवंबर) को गाँव हेडिया, जिला जालंधर, पंजाब में माता हरकौर जी की गोद में हुआ, पूरन दास जी उनके पिता थे। बचपन से ही उन्होंने सांसारिक वस्तुओं से असाधारण वैराग्य और परमात्मा के प्रति गहरी लालसा प्रदर्शित की।
उन्होंने ॐ बापू नारायण दत्त जी महाराज से नाम दीक्षा प्राप्त की और स्वयं को पूर्ण रूप से त्याग और तपस्या के जीवन को समर्पित कर दिया। उन्होंने सांसारिक पद और संपत्ति का त्याग किया, कठोर आध्यात्मिक साधना का मार्ग चुना। उनकी कठोर साधना के काल और नंदाचौर धाम के साथ उनके गहरे संबंध ने उनकी आध्यात्मिक यात्रा को गहराई से आकार दिया।
उनकी करुणा, निस्वार्थ सेवा और गहन आध्यात्मिक प्रभाव ने अनगिनत जीवन को स्पर्श किया। उन्होंने तीन प्रमुख शिष्यों — नंदाचौर के बापू शरधा राम जी महाराज, गाँव अत्ती के भगत ज्वाला जी और सहारनपुर के बापू दया किशन जी महाराज — का मार्गदर्शन किया, जिनमें से प्रत्येक ने उनकी दिव्य विरासत को आगे बढ़ाया। बापू हरनाम जी महाराज 12 अस्सुज, संवत 2002 विक्रमी (सितंबर 1945) को ओकारा, अब पाकिस्तान में, ज्योती ज्योत समा गए।
त्याग और तपस्या — सच्चा वैराग्य और समर्पित तपस्या — ही परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग है।
आध्यात्मिक वंशावली
दर्शन और प्रवचन